कुहूके कोयलिया
तोर अंगना म हो मा....कुहूके कोयलिया...x2
चढ़ - घोर थे भकती के,रसना ना हो मा......
येहो रसना ना मा.... तोर भुवना मा....
कारी वो कोयलिया बइठे हे आमा डार
काया ले पंछी फेर मानुस कस चिंहार
चढ़ -लागा थे अजब मिठ बोलना हो मा......
येहो बोलना हो मा.... तोर भुवना मा....
कुहूके ज़ब कोयलिया स्वाशा के ले आधार
जाने बिन कइसे भकती के जोड़े तार
चढ़ -धनहे ये गौतम परेवना हो मा.....
ये परेवाना हो मा.... तोर भुवना मा....
श्रेणी : दुर्गा भजन
Kuhuke Koyaliya Tor Angna Ma | कुहूके कोयलिया तोर अंगना म | Divesh Sahu | CG Jasgeet 2025 | Navratri
"कुहूके कोयलिया तोर अंगना मा" एक सुंदर छत्तीसगढ़ी दुर्गा भजन है, जो माता दुर्गा की पूजा और भक्ति को व्यक्त करता है। इस भजन में कोयल के स्वर और उसके गीतों के माध्यम से भक्त अपनी भक्ति और समर्पण का भाव व्यक्त कर रहा है। इस भजन में माता के प्रति प्रेम और श्रद्धा की गहरी भावना को चित्रित किया गया है, जिसमें भक्ति के रस को महसूस किया जा सकता है।
भजन में कोयल के गीतों की छटा और उनकी आवाज को एक माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे भक्ति का रस मिलकर मनुष्य के हृदय में बसेगा। "तोर अंगना मा" का अर्थ है माता के आंगन में, और यहां कोयल के गीतों को उनके आंगन में बसी आवाजों के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
भजन में यह भी कहा गया है कि भक्त की जुबान द्वारा जो मिठास और शब्दों का उच्चारण होता है, वह भक्ति को और भी ज्यादा सुगम बनाता है। जब भक्त अपने शब्दों से माता की पूजा करता है, तो वह भक्ति के गहरे रस में डूब जाता है और मनुष्य के हृदय को शांति और संतोष मिलता है।
गौतम परेवना का जिक्र भी इस भजन में है, जो संभवत: एक संदर्भ है, जो भक्ति और साधना के उच्चतम रूप को दर्शाता है। इसमें यह भी कहा गया है कि माता की भक्ति के बिना जीवन अधूरा होता है, और इस भजन के माध्यम से भक्त अपने जीवन को माता के चरणों में समर्पित करने की भावना व्यक्त कर रहा है।
"कुहूके कोयलिया तोर अंगना मा" न केवल एक संगीतात्मक अनुभव है, बल्कि यह एक आध्यात्मिक मार्गदर्शन भी है, जो भक्तों को भक्ति की गहरी समझ और अनुभव देता है।